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Wednesday, 26 November 2025

बच्चे लापता हो रहे हैं

 मोदी जी गुमशुदा और लापता बच्चे जो बस , ट्रेन में भटक रहे हैं कोई पैदल भी है कोई किसी की गाड़ी में जाता रहता है।  इन्हें तुरंत घर पहुंचने के लिए कोई ऐसा तरीका निकालो कि कोई भी इनकी मदद के लिए आगे आए।  बच्चे अपने घर पहुंचना चाहते हैं न कि फोस्टर केयर तक । ऐसी बकवास व्यवस्था न करें । बिल्कुल नहीं मिलता ऐसा नहीं हो।  इनके घर में कोई न मिले इनके रिश्तेदार तक न मिले तो ही करो । पुलिस द्वारा डांट कर पूछे जाते हैं कि कहां रहते हो । कई बच्चे भूल ही जाते हैं याद नहीं आ पाता । थाने में ले के जाते हैं तो हमें ही खा जाते हैं पुलिस वाले।  कोई रिपोर्ट करने वाला नहीं मिले तो अपने आप रिपोर्ट बन सकता है क्या । खोयापाया जैसे वेबसाइट ऐप बनाए गए हैं लेकिन मदद नहीं मिला । एक बच्ची के लिए प्रयास किया था । लेकिन पुलिस वाला उल्टे मुझे पूछ लिया जिम्मेदारी लेते हो क्या । मदद लेने मै उसके पास गया था न कि दुकान खोलने । कोई भी व्यक्ति तुरंत सूचना दे ऐसी व्यवस्था करो।  बस, ट्रेन में होने पर वहां कैमरे की व्यवस्था की जाए और अलग से टीवी चैनल जिसमें लाइव मालूम पड़े कौन बच्चा बिना किसी के साथ अकेले किस गाड़ी में बैठा हुआ है । इतना सब होने पर एक शत्रु हमे हमीं से छुपाने लगता है।  हमारा मानसिक शत्रु । जिससे हमारी चालाकी से हमारा ही भला न हो । इतनी घातक तकलीफ होती है बच्चों को । जान जाने के लिए । बच्चों को अच्छा भविष्य देना है तो उन्हें जाकर क्यों न उनके घर पहुंचाया जाए । रिपोर्ट करने के लिए जब कोई नहीं होगा तो कौन जाके खोजबीन करेगा।  देश के विकास के लिए बच्चों को सशक्त बनाना है तो यह समस्या नहीं होना चाहिए । बच्चा कही खो गया और उसे ढूंढ रहे हो । शत्रुओं को बच्चे ही नहीं होने चाहिए घर में ऐसी समस्या है । बस, ट्रेन में बच्चे को देखने पर खराब लगता है क्योंकि वो गलत एड्रेस में जा रहे होते हैं और रोना बिलखना होता रहता है। लोग देखते हैं कोई पूछता है तो बच्चे नकली जैसा जवाब देते हैं अंदाजा होता है कि वह उनका घर होगा । और जब जाते हैं तो नहीं मिलता । सोच के देखो । कितनी खराब स्थिति है । ये इंडिया में होता रहता है हर जिले में । कोई जाके देखता है क्या ? पहुंचे या नहीं । किसी को फुर्सत नहीं । अपने घर से मतलब रखो । बस , ट्रेन में बच्चे हो बिना किसी के साथ तो कौन क्या करे जिससे मदद हो। मोबाइल भी है जेब में।  घर वाले रिपोर्ट करेंगे तो ही पुलिस कुछ करे । न करे तो ? अपने से मदद करो तो कुछ बात बनेगी । जिम्मेदारी उठाने वाले ऐसे लोग मिलते जो बहुत पावरफुल लगते हैं केवल अपने घर के लिए । दूसरे के मदद के लिए जो मानक होते हैं वो ये पूरे नहीं होते हैं । इनकी पत्नी होती है जिसे कोई छेड़े तो ये चुनाव तक लड़ने जा पहुंचेंगे । रोते बिलखते बच्चों को कोई कहां ठहराए । उनका रोज का खाना पीना कौन कराए । सरकार को यह व्यवस्था हर जगह करनी होगी । बच्चे शांत होंगे तो उन्हें याद करने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो उन्हें याद करने में मदद भी करे।  कुछ बच्चों के बारे में लोग जानते हैं जो बच्चों के घर पहुंचने में मदद करेंगे।  इस प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए ।  बच्चों को देखने के समय से उनकी घर पहुंचने की व्यवस्था सुनिश्चित हो । पुलिस तक पहुंचाए और पुलिस कहे खुद ही देख लो । कोई भी बिना रिपोर्ट हुए भी मदद करे इसके लिए । यहां पर एक बात बताना चाहता हु कि पुस्तक वाला इससे दूर रहे । क्योंकि हीरोगिरी किसी काम की नहीं । तू खुद ही गुमशुदा है अपने घर का हीरोगिरी में क्या होगा तेरे से । होता भी नहीं ।

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